*968 काहे सोच करे नर मन में वह तेरा रखवाला है।।440

काहे सोच करे नर मन में वह तेरा रखवाला है रे।।
घर भगवा से से जब तू निकला दूध कुचन में डारा है रे बालापन में पालन कीन्हा माता मोह द्वारा है रे।।
   रक्षा मनुष्यों के कारण पशुओं के हित चारा रे।
   पक्षी वन में पान फूल फल सुख से करत आहारा रे।।
जल में जल सर रहता निरंतर खामोश करा रहा है रे।
नाग बसे भूतल के मांही जीवे वर्ष हजारा रे।।
      स्वर्ग लोक में देवन के हित, बहत सुधा की धारा रे।
      ब्रह्मानंद फिकर सब तज कर सुमिरो सर्जन हारा रे।।

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