*1532. चल हंसा वही देश जहां तेरे पीव़ बसे हैं।।670।।

         चल हंसा वही देश जहां तेरे पीव  बसे हैं।।
नो दस मूल दसों दिसी खोले सुरती गगन चढ़ावे।
चढ़े अटारी सूरत संभाली फिरना भवजल आवे।।
       जगमगज्योत गगन मैं झलके बिरह राग सुनावे।
       मधुर मधुर अनहद बाजे, प्रेम अमृत झड़ लावे।।
ठाडी मुक्ति भरे जहां पानी लक्ष्मी झाड़ू लगावे।
अष्ट सिद्धि खड़ी कर जोड़ ब्रह्मा वेद सुनावे।।
      जग में गुरु बहुत कनफूका, पानी लाई बुझावे। 
      कहे कबीर सोई गुरु पूरा, कंत ही आन मिलावे।।

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