*1506. हंसा परम् गुरु जी के।।660।।

                               660
हंसा परम् गुरू जी के देश चलो, जहां अमर उजाला रे।।

धरती नहीं आकाश नहीं, ना वहाँ पवन पसारा रे।
बिन सूरज बिन चन्दा जहां, चमक अपारा रे।।

बिन बादल बरसात बरसती, अमृत धारा रे।
पीवै सन्त सुजान सुरमा, ही मतवाला रे।।

ब्रह्मा वेद पुराण कली में, कहते हारा रे।
जाना नहीं निज रूप भर्म में, डूब गया सारा रे।।

गम बेगम के पार परमपद, ज्ञान करारा रे।
शिवकरण स्वरूप समझ, तेरा दीदारा रे।।

Comments

Popular posts from this blog

*1272. रस गगन गुफा में अजर झरै।।560।।

स्वामी रणजीत सिंह प्रवचन।।

लेकिन कैसे बुद्ध जी..कैसे अप्प दीपो भव ? But how Buddha ji .. how appo you be?