*1504. कहो पुरातम बात।।660।।

                            
                               660
कहो पुरातम बात, हंसा कहो पुरातम बात।।
    कहां से हंसा आइया रे, उतरा कौन से घाट।
    कहां हंसा विश्राम किया तनै, कहाँ लगाई आश।।
बंकनाल तैं हंसा आया, उतरा भँव जल घाट।
भूल पड़ी माया के वश में, भूल गया वो बात।।
    अब तूँ हंसा चेत सवेरा, चलो हमारी साथ।
   शंसय शोक वहां नहीं व्यापै, नहीं काल की त्रास।।
सदा बसन्त फूल जहां फूलें, आवै सुहंगम बॉस।
मन मोरे क्यूँ उलझ रहे हो, सुख की नहीं अभिलाष।।
    मकर तार से हम चढ़ आए, बंकनाल प्रवेश।
    सोई डोर अब चढ़ चलो रे, सद्गुरु के उपदेश।।
जहां सन्तों की सेज बिछी है, ढुरें सुहंगम चौर।
कह कबीर सुनो भई साधो, सद्गुरु के सिर मोर।। 


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