*1503. हंसा हंस मिले सुख होइ।।659।।

                                    
                                659
हंसा हंस मिले सुख होइ। रे हंसा।
ये तो पाती है रे बगुलन की, सार न जाने कोई।।
  जो तूँ हंसा प्यासा क्षीर का, कूप क्षीर ना होइ।
  यहां तो नीर सकल ममता का, हंस तजा जस खोई।।
छः दर्शन पाखण्ड छियानवे, भेष धरै सब कोई।
चार वर्ण औऱ वेद कुराना, हंस निराला होइ।।
    ये यम तीन लोक का राजा, शस्त्र बांधे सँजोई।
    शब्द जीत चलो हंसा प्यारे, रह जा काल वो रोइ।।
कह कबीर प्रतीत मान ले, जीव ना जाए बिगोई।
अमरलोक में जा बैठा हूँ, आवागमन ना होइ।। 


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