*1511. हम हंसा उस ताल के।।662।।

 

                                       662

     हम हंसा उस ताल के जी, जहां मानक लहरी।।
    हंसा तो मोती चुगें, बुगला मछली का वैरी।।
है कोय देशी म्हारे देश का, परखनिया जोहरी।
त्रिवेणी की धार में, सुरतां न्हा रही मोरी।।
    पाँच तत्व की हेली बनी रे, बिच रख दई मोरी।
    सुन्न शिखर में भया चांदना,लगी सोहंग डोरी।।
चार चकुटे बाग में जी, बीच रख दई मोरी।
बेल अंगुरां लाग रही, खिली केशर क्यारी।।
    बारामासी फल लगें, मीठा स्वाद चकफेरी।
    ज्ञान शब्द की झाल रे, म्हारी नागिन जहरी।। 

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