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Showing posts from December, 2024

**811 रे उस कारीगर ने माटी का खेल बनाया।।

रे उस कारीगर ने माटी का खेल बनाया।। तूं भी माटी मैं भी माटी, माटी की है काया। इस माटी के अंदर रहता, उस का भेद न पाया।। माटी आवे माटी जावे, माटी की है छाया। इस माटी की पहर जुगलिया, अदभुत नाद बजाया।। माटी आवे माटी जावे माटी भाग बनावे। अंत समय में माटी होगी, क्यों मूर्ख गर्भाया।। माटी में से माटी निकले, माटी माहें समाया। माटी के में पहर जुगलिया, एक अंत दर्शाया।। खोज करो उस कारीगर की, जिस ने ढोंग रचाया। ढोंगी का जो ढोंग समझ गया, वो बावहड़ जन्म ना आया।। गुरु मंगल दास ढोंग ने समझे, कालबली भय खाया। गुरु से निर्भय हो चालों, वेद सार बतलाया।।

**450 मेरा सैया खो गया री।।

मेरा सैयां खो गया री, अलबेला खो गया री।                  मोह माया के व्यवहार में।। सास मेरी लीपे ननद लिपवावे,                  अलबेला लीपे री, वो लीपे गोबर गार में।। काशी भी ढूंढा मथुरा भी ढूंढा,                कनखल में ढूंढा री, वो ढूंढा हरिद्वार में।। जल में भी ढूंढा थल में भी ढूंढा,                 इस दिल में ढूंढा री, वो ढूंढा सब संसार में।।  कह  कबीरा मस्त फकीरा,                 गुरु ज्ञान गंभीरा री, वो पाया सुन्न भंडार में ।।         

**800 साधो जग जालिम हम पाया।।

साधो जग जालिम हम पाया। जो भी आया भला करन को, उसी को दिया मरवाया।। नानक साहब थे संत वक्त के, सत का रुक्का लाया। उस को भी नहीं बक्सा जग में, जेल में चून पिसाया।। रविदास भक्त थे त्यागी वैरागी, तज दी थी जिने माया। उसकी परीक्षा ऐसी लिन्ही, चिरवा दी थी काया।। जलाल पुर में पलटू हुए, जीने भेद अगर का गाया। सत की पैड़ी तजी नहीं, बीच ताते तेल घुमाया।। कबीर साहब थे संत बड़े, जीने जात जुलाहा पाया। बदी करी कांसी के बांध ने, वो संत बड़ा सताया।। ईसा मसीह ने इस जग के, दुखियों का दुख मिटाया। मेख मार के हाथ पांव में, फट्टे बीच चिनाया।। दादू दावा दूर किया जीने, गुण मालिक का गाया। धोखा दिया और मार पड़ी, हाथ जोड़ के पिंड छुड़ाया।। मीरा भजे थी मुर्शीद अपने ने, राणा ने नहीं भाया। हरि भजन में मग्न थी रहती, प्याला जहर पिलाया।। ऋषि दयानंद इस दुनिया में, समाज सुधारण आया। महा पुरुष का अंत करन को शीशा घोल पिलाया।।

**782 सतगुरु साहिब ने मेरा भर्म तोड़ दिया।।

सतगुरु साहिब ने मेरा भर्म तोड़ दिया।।                एक सतनाम अमर, विषयों से मन मोड दिया।। लख चौरासी के चक्र में भटकता दर दर।                दया करके दयानिधि दया से जोड़ दिया।। मैं तो भुला हुआ भूलो में ही भटकता रहा।               पाया गुरु नाम तो अपना चलन छोड़ दिया।। बुरे कर्मों की कमाई से कमाया हर दिन।               धरा सिर पाप का मटका गुरु ने फोड़ दिया।। काल के जाल में रमते रहे यूं ही सारे।               साहिब कबीर ने बंधन का कर्म छोड़ दिया।।                       

**1339 फकीरी का देखा लटका।।

फकीरी का देखा लटका। गृह चार से मोह हटाया, छोड़ दुनी का खटका।। आसन पद्म थिर लगाया, मूल कमल का छेदा खटका। सासमसांसा अजपा ना सिवरना, ना कोई खेचरी सटका।। बंक नाल उल्टे राधाया, रस्ता कहीं ना अटका। पल में संगम चढ़ग्या इकबारी, ज्यों बांस चढ़ा नटका। खंड मंड वेद ब्रह्मांड छेदा, सहारा लिया औघट का। सूरतकी कूंचीसमझ करलगाई, ताला खुल गया फाटक का।। मेहर जब लेहरम पाया, दर्शा देव प्रगट का। शीतलनाथ मजा फकीरी में, वास किया उसी तट का।।

नई कबीर भजन सूची।।

         ऐसी भूल दुनिया के अंदर।।          और व्यापार तो बड़े हैं।।           क्या ग़र्ज पड़ी संसार में जब लिया फकीरी बाणा।।          क्या बैठा हंस उदास।।         क्या भूला दीवाने।।         क्यों भटके बाहर क्यों भटके।।        कठिन सांवरे की प्रीत।।        कोई आवे है कोई जावे है।।        तूं चेत प्यारे अपने आप को चेत।।        भरम जाल में जगत फंसा है।।         मन का धोखा भागा रे भाई।।          त्रिकुटी में झांक सुरता।।        हो तेरे कोना बस का रोग।।         हरि बिन कौन सहाई मन का।।         हरि बिना ना सरे री माई।। विनती।। काहे की भेंट चढ़ाऊ गुरु थारे।।1।। किस पर  मैं जां तुमने तो छोड़ दाता जी।।2।।  एक नाम लग जाऊं गुरुजी थारे। ।3।। सतगुरु अपने के सम्मुख रह...