**1339 फकीरी का देखा लटका।।

फकीरी का देखा लटका।
गृह चार से मोह हटाया, छोड़ दुनी का खटका।।

आसन पद्म थिर लगाया, मूल कमल का छेदा खटका।
सासमसांसा अजपा ना सिवरना, ना कोई खेचरी सटका।।

बंक नाल उल्टे राधाया, रस्ता कहीं ना अटका।
पल में संगम चढ़ग्या इकबारी, ज्यों बांस चढ़ा नटका।

खंड मंड वेद ब्रह्मांड छेदा, सहारा लिया औघट का।
सूरतकी कूंचीसमझ करलगाई, ताला खुल गया फाटक का।।

मेहर जब लेहरम पाया, दर्शा देव प्रगट का।
शीतलनाथ मजा फकीरी में, वास किया उसी तट का।।


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