**782 सतगुरु साहिब ने मेरा भर्म तोड़ दिया।।

सतगुरु साहिब ने मेरा भर्म तोड़ दिया।।
               एक सतनाम अमर, विषयों से मन मोड दिया।।
लख चौरासी के चक्र में भटकता दर दर। 
              दया करके दयानिधि दया से जोड़ दिया।।
मैं तो भुला हुआ भूलो में ही भटकता रहा।
              पाया गुरु नाम तो अपना चलन छोड़ दिया।।
बुरे कर्मों की कमाई से कमाया हर दिन।
              धरा सिर पाप का मटका गुरु ने फोड़ दिया।।
काल के जाल में रमते रहे यूं ही सारे।
              साहिब कबीर ने बंधन का कर्म छोड़ दिया।।



                      

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