**811 रे उस कारीगर ने माटी का खेल बनाया।।
रे उस कारीगर ने माटी का खेल बनाया।।
तूं भी माटी मैं भी माटी, माटी की है काया।
इस माटी के अंदर रहता, उस का भेद न पाया।।
माटी आवे माटी जावे, माटी की है छाया।
इस माटी की पहर जुगलिया, अदभुत नाद बजाया।।
माटी आवे माटी जावे माटी भाग बनावे।
अंत समय में माटी होगी, क्यों मूर्ख गर्भाया।।
माटी में से माटी निकले, माटी माहें समाया।
माटी के में पहर जुगलिया, एक अंत दर्शाया।।
खोज करो उस कारीगर की, जिस ने ढोंग रचाया।
ढोंगी का जो ढोंग समझ गया, वो बावहड़ जन्म ना आया।।
गुरु मंगल दास ढोंग ने समझे, कालबली भय खाया।
गुरु से निर्भय हो चालों, वेद सार बतलाया।।
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