**800 साधो जग जालिम हम पाया।।

साधो जग जालिम हम पाया।
जो भी आया भला करन को, उसी को दिया मरवाया।।

नानक साहब थे संत वक्त के, सत का रुक्का लाया।
उस को भी नहीं बक्सा जग में, जेल में चून पिसाया।।

रविदास भक्त थे त्यागी वैरागी, तज दी थी जिने माया।
उसकी परीक्षा ऐसी लिन्ही, चिरवा दी थी काया।।

जलाल पुर में पलटू हुए, जीने भेद अगर का गाया।
सत की पैड़ी तजी नहीं, बीच ताते तेल घुमाया।।

कबीर साहब थे संत बड़े, जीने जात जुलाहा पाया।
बदी करी कांसी के बांध ने, वो संत बड़ा सताया।।

ईसा मसीह ने इस जग के, दुखियों का दुख मिटाया।
मेख मार के हाथ पांव में, फट्टे बीच चिनाया।।

दादू दावा दूर किया जीने, गुण मालिक का गाया।
धोखा दिया और मार पड़ी, हाथ जोड़ के पिंड छुड़ाया।।

मीरा भजे थी मुर्शीद अपने ने, राणा ने नहीं भाया।
हरि भजन में मग्न थी रहती, प्याला जहर पिलाया।।

ऋषि दयानंद इस दुनिया में, समाज सुधारण आया।
महा पुरुष का अंत करन को शीशा घोल पिलाया।।



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