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*1443. मेरे साधु भाई पारख है निज ज्ञान।। मस्ताना।।634।।

                              634 मेरे साथ हूं भाई पारख़ है निज ज्ञान।। करके देखो परम गुरु की दरसे नूर निशान। शब्द सुरती दोनों लए हो गए मिट गया आवन जान।। सात मंजिल पर बिलख भोम है ना धरती ना आसमान। अजपा जाप है नहीं और ना सुमिरन ना ध्यान।। दिन-रात भजन का ना बेरा पाटे, रहता एक समान। आधार पर सतगुरु बस्ती वहां ना धरती ना भान।। बिन बक्शीश पहुंच नहीं सकता पारख पद निर्माण। कह छः सो मस्ताना पहुंचे दे शीश गुरु ने दान।।

*1442 तेरा जीवन है बेकार गुरु ज्ञान के बिना।। 633।।

                            633 तेरा जीवन है बेकार गुरु ज्ञान के बिना।। क्यों करता मेरा मेरी, यहां कौन चीज है तेरी। जो बीत गई सो भतेरी।तेरी जिंदगी अधूरी रह जाएगी।                                                    कल्याण के बिना।। क्यों करता है मनमानी संतो की बात नहीं जानी।। तुम बन बैठा अभिमानी। फिर अंत समय पछताएगा।                                             गुरु नाम के बिना।। जो गुरु शरण में आगया, वह मोक्ष पदार्थ पा गया। परमार्थ में हाथ बढ गया।नहीं कटे चौरासी तेरी बंदे।                                             गुरु ध्यान के बिना।। सतगुरु समनदास समझावे भूले को राह बतावे।...

*1441 असल निज सार है भाई साधु,।।632।।

असल निज सार है भाई साधो, सतगुरु सेन देई।।  सूरता कियो विचार निरत जीने साचो कीयो,  पांच पच्चीस को मार अगम को मार्ग लिओ।। जा पहुंची उस देश में निर्भय जहां निशान। रैन दिवस वहां है नहीं रे, ना चंदा ना भान।। कैसे कहूं बना ये देश सतगुरु का ऐसा,  जलती ज्योत अखंड दीप बिन हुआ उजासा।। आवागमन वहां है नहीं रे मरण जीवन वहां ना। मेहर हुई गुरुदेव की रे वह घर दिया दिखाएं।। घटा उठी घनघोर झरे जा अमृतधारा। पीवे संत सुजान हरिजन हरि का प्यारा।। अनहद का बाजा बाजे रे, अधर गलीचे मां। अटल धाम पे बैठ के वो, अंत करें विश्राम।। लावे दास कमाल कमल गुरु ब्रह्म समाना। बैठा संत सुजान मुक्ति का सही निशाना।। चरण कमल की सेज पर लगे तिहारी दास। भंव जल फेरा पाए के, पहुंचे अगम अपार।।

*1440. म्हारे साधो भाई सुनो जी बात अगम की।

म्हारे साधो भाई सुनो जी बात अगम की।। सहस कंवल दल त्रिकुटी मंडल, वहां पर बैठक यम की। लाख जतन कर चल आगे को मेटो चोट सघन की।। बिन पानी वहां ताल भरे, बिन बादल दामिनी दमकी। बिन तरवर वहां बाग लगे है कोयल बोले वन की।। आगे चल के देख प्यारी एक ज्योति सी चमकी। हीरे मोती लाल जड़े हैं खान खुली वहां धन की।। वहां पर चलकर आनंद देखा सुरती पहुंची जिनकी। ताराचंद कौ गुरु अरमान मिले, सब मेटी बातें विघ्न की।।

*1439। तेरे दुख काटे अविनाशी।।629पी।।

तेरे दुख काटे अविनाशी यह है बेगम पुर के वाशी।             रटना रट लियो शाम सवेरे गुरु के नाम की।। मीरा तार कमाली तारी, तारे सजन कसाई।  भवसागर से पार करेंगे तेरे सतगुरु दाई।     बंधन काट देवें सत्संग में, रंग ले अपने रंग में।। नामदेव की गाय जीवाई ऐसे हैं दातारा। भीलनी के बेर खाए राम ने, कर दी भव से पारा।       चौकी तोड़ बगाइ यम की, हमे फिक्र नहीं उस गम की।। सिकंदर जी गए जेल में, चक्की खूब चलाई। हार मान गया लोधी सिकंदर से, चरणों में शीश नवाई।              संतों की लाज बचाई, दिया आत्मज्ञान कराई।। राम लक्ष्मण ने प्रकट होकर निर्गुण भक्ति कमाई। कस्बा उन में खुला गुरुद्वारा, सत की राह चलाई।        झुक गई वहां दुनिया सारी, सतगुरु की महिमा न्यारी।। संत शिरोमणि रविदास चरण में, गुरु गांधी सुख पाए। गुरु समन दास बेगम के वासी, वो ही देश बताएं।     विजय ज्ञान गुरु के प्यारे, वे हुए दुनिया से न्यारे।।

*1439.. पाया अमरापुर में वास, भाग जिनका पूर्वला जाग्या।। 630

पाया अमरापुर में वास भाग जिनका पूर्वला जाग्या।। सच्चे गुरु से हुई प्रीति सेल शब्द रा लाग्या। धर दूरबीन सितार दिखायो, भर्म गया भय भाग्या।। जाग्या पीछे फिर सोवेगा तो कौन कहेगा जाग्या।। काल सिरहाने न्यू खड़ा रे, खड़ा खड़ा वो पछता गया। काग हंस का अंतरा रे, ढंग एक सा लाग्या। काग की संगत छोड़ बावले फेर हंस हो ज्यागा।। चलो हंसा अमरापुरी रे, करो शब्द रा साथा। जन्म जन्म के पाप कटेंगे, मिटे दमडा रा दागा।। शब्द सकल का जंग झोवे तू चौरासी में लाग्या।। कह कबीर सुनो भाई साधो, सहज सहज मन लाग्या।।

*1438. उठ सुन्न शिखर को चाल।

उठ सुन्न शिखर को चाल, दिखाऊं तने हरि नगरी। जहां तूरियां पद निज धाम, लगी है प्रेम की झड़ी।।  पांचो रोक रही है बाट, मार्ग में जा पकड़ी।। गुरु मिले गुमानी राम, भरम की तोड़ी गगरी।। हुए नितानंद गलतान, आत्म से देह बिसरी।।