*1441 असल निज सार है भाई साधु,।।632।।
असल निज सार है भाई साधो, सतगुरु सेन देई।।
सूरता कियो विचार निरत जीने साचो कीयो,
पांच पच्चीस को मार अगम को मार्ग लिओ।।
जा पहुंची उस देश में निर्भय जहां निशान।
रैन दिवस वहां है नहीं रे, ना चंदा ना भान।।
कैसे कहूं बना ये देश सतगुरु का ऐसा,
जलती ज्योत अखंड दीप बिन हुआ उजासा।।
आवागमन वहां है नहीं रे मरण जीवन वहां ना।
मेहर हुई गुरुदेव की रे वह घर दिया दिखाएं।।
घटा उठी घनघोर झरे जा अमृतधारा।
पीवे संत सुजान हरिजन हरि का प्यारा।।
अनहद का बाजा बाजे रे, अधर गलीचे मां।
अटल धाम पे बैठ के वो, अंत करें विश्राम।।
लावे दास कमाल कमल गुरु ब्रह्म समाना।
बैठा संत सुजान मुक्ति का सही निशाना।।
चरण कमल की सेज पर लगे तिहारी दास।
भंव जल फेरा पाए के, पहुंचे अगम अपार।।
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