*1468 उस देश चलो म्हारी हेली, आप में आप तूही रह जाए।।

उस देश चलो म्हारी हेली आपे में आप रह जाए।।
तात मात भ्रात लक्ष्मी, ना पुत्र न दारा हो।
वर्ण आश्रम तीन लाज से सहजे जहां किनारा हो।
        ना शत्रु ना प्यारा हो, या दुई भींत तेरी ढह जा।।
नाम और रूप कर्म शक्ति, जहां रंग आकार नही कुछ है।
पानी पवन आकाश पृथ्वी, तत् विस्तार नही तुच्छ है।
    त्रिगुण माया रहे नही जहां, ये कर्तव्य कर्म सभी ढह जा।।
चारों वाणी पुगे नाही, मन बुद्धि थक जावें हैं।
जप और जाप थके दोनों, जहां अजपा मर जावे है।
      हट के फेर बोहड़ नही आवे, वहां की गई वहीं रहजा।।
जीव और ईश्वर ब्रह्म कल्पना, गुरु शेर सिंह देव कह कोन्या।
दास हरपाल तूं ही तूं जहां पे, जन्म मरण दुख भय कोन्या।
     रामखुदा भी रह कोन्या, तेरी अनुभव ध्वजा चढ़ी रहजा।।

Comments

Popular posts from this blog

स्वामी रणजीत सिंह प्रवचन।।

*1272. रस गगन गुफा में अजर झरै।।560।।

**1339 फकीरी का देखा लटका।।