*1558. हो संतो का सत्संग वहां नित जाइए।

हो संतो का सत्संग वहां नित जाइए। 
       उप का आत्मज्ञान राम गुण गाइए।।
संतोके संग प्रीत पले तो पा लिए।
                राम भजन में देह गले तो गालीये।।
यह तन ऐसा जान बालू की भींत है।
               बूंद पड़े गल जाए अधर की नीव है।।
यह तन ऐसा जान कि बर्तन कांच का।
               लगे ठोकर फूट जाए भरोसा ना सांस का।।
वह सभा जलजाए कथा नहीं रामकी। 
             बिन नोशे की बारात कहो किस काम की।।
मलते तेल फुलेल काया बड़ी चाम की।
               मर्द गर्द में मिल जाए दुहाई सतनाम की।।
हाथ सुमरनी बगल कतरनी कांख में।
               आग बुझी मत जान दबी है राख में।।
सूखेंगे सरवर ताल कमल मुरझाएंगे। 
               तड़पैं हमारे सब जीव, काल भख जाएंगे                

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