1551 सतगुरु सरने आए राम गुण गाइए।

सतगुरु शरण में आए राम गुण गाइए।
तेरा अवसर बीता जाए फिर पछताइए।।
              झूला तो नरक द्वार, मांस ना बीच रे।
             तूने किया था कोल करार ,भूल गया मीत रे।।
लगा तेरे लोभ अपार माया के मद का।
बंद गया रे बंधन अपार नाम तू ना ले सका।
            माया में अंधा हुआ, मृग जल डूब रे।
            तू तो भटकत फिरे गवार माया के रूप रे।।
मोह को करके मैल, श्वान ज्यों भोंक रहा।
तू तो शुद्ध स्वरूप विसार, चौरासी लाख फिरा।।
       यह जग है मूड अज्ञान कार शुद्ध ना करें।
       भानी नाथ बिनानाम, कार्ज कैसे सरे।।

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