1470 शब्द झड़ लाग्या हे हेलि बरसन लग्या रंग।।

शब्द झड़ लागया हे हेली बरसन लागा रंग।।
सुमिरन नाम भजन लो लागी, जन्म मरण की चिंता भागी।
       सतगुरु दिनही सेन सत घर पा गया हे।।
चढ़गई सुरती पश्चिम दरवाजा, त्रिकुटी महल पुरुष एकराजा।
       अनहद की झंकार बजे जहां बाजा हे।।
अपने पिया संग जाके सोई, संशय शोक रहा नाकोई।
     कट गए करम क्लेश भरम भय भागा हे।।
शब्द विहंगम चल हमारी कहे कबीर सतगुरु दी ताली।
      रिमझिम रिमझिम होय, कॉल वश आ गया हे 

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