*1540. फिर तू धोखा खावेगा जब लूटे हंस रस्ते में।।

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फिर तू धोखा खावेगा, मत लूटे हंस रस्ते में।।

नर देही की कदर ना जानी ना संतो की बात पहचानी।
माया मद में रहा टूलता, उम्र चली गई सारी।
                                 वक्त फिर हाथ न आवेगा।।
काम क्रोध मद लोभ ने घेरा, बिन सतगुरु कोई ना तेरा।
यह संसार जुए की बाजी हार जीत एक सार।
                               पूंजी यहां पर खोवेगा।।
कनक कामिनी से नाता जोड़ा इंद्रियों से मन ना मोड़ा।
अंत समय में पकड़ा जागा कोई ना आवे पास।।
                              फिर तू खड़ा लखावेगा।।
काया माया यह नहीं तेरी क्यों करता है मेरा मेरी।
प्रकाशनंद कह गुरु भजन बिन, आवेगा यम लेन।
                             फेर तू बैठा रोवेगा।।

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