*1487. हेली छोड़ दे विराना देश।। 652।।

                                652
हेली छोड़ दे वीराना देश चलो सतगुरु जी की शरण रे।।

राम कृष्ण अवतार देवनार यह  करें सुमर्णा रे।
शिव ब्रह्मा अधिक शीश धरे सतगुरु जी के चरणों रे।।

निर्मल भक्ति सतगुरु जी की घट भीतर धरना रे।
मलिन किसी के आवे मन में दूर भगाना रे।।

मन ममता और मोह त्याग भाव भक्ति का भरना रे।
गुरु भक्ति वैराग्य बिना चोरासी में फिरना रे।।

गुरु पद पारख सार समझ के अनुभव करना रे।
शिव करण पारक कर अपनी फिर नहीं डरना रे।।

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