*1514. रे हंसा भाई देश पुरबले जाना।।663।।

                               663
रे हंसाभाई देश पूरबले जाना।।

विकट नाट रपटीली कैसे करूं पयाना।
बिन भेदी भटक के मरीयो, खोजी खोजी सयाना।।

वहां की बातें अजब निराली अटल अविचल अस्थाना।
निराकार निर्लम्ब विराजे रूप रंग की खाना।।

चंद्र चांदनी चौक सजा है फूल खिले बहू नाना।
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे, मौसम अजब सुहाना।।

मानिक मोती लाल घनेरे हीरो की वहां खाना।
तोल मोल कोई गिनती नहीं अपरंपार खजाना।।

नूर नगरिया कोश अठारह, ता का बांध निशाना।
अखंड आवाजां मोहन बाजे, वहां का पुरुष दीवाना।।

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