*1515. हनसा कौन लोक के वासी।।664।।

हंसा कौन लोग के वासी।।

कौन लोक से आया अंसा कौन लोग को जासी।
क्या-क्या कॉपी उस लोग की हमको कहो जरा सी।।

अमर लोक से हम आए हैं जहां पुरुष अविनाशी।
दुख सुख चिंता नहीं वहां पर ना कोई शौक उदासी।।

दीया बाती चांद सूरज सदा वहां उजियासी।
बीन बांसुरी मिरदंग बाजे, छः ऋतु बारह मासी।।

हीरे पन्ने लाल वहां पर अर्पण सूर्य प्रकाशी।
अगम अपार हवा वहां की करें आराम काया  सी।।

सतगुरु ताराचंद समझा में कुंवर ने अंदर की करो तलाशी
लोक हमारा।।।।

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