*1520. मत लूटे हंस रस्ते में।।665।।
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मत लूटे हंस रस्ते में, उड़े तनै कौन छुड़ावेगा।आदम देही धार के तू, गया ईश्वर ने भूल।
ओछे मंदे काम करें तने, खो दिया ब्याज और मूल।
गुरु बिन न्यूए जावेगा।
बाजी खेली पाप की अरे, पोह पे अटकी सार।
सत का पासा फेंक बावले, उतरे भव जल पार।
गुरु बिन धक्के खाएगा।।
विषयों में तू लगा रहे और पड़ा रहे बीमार।
सिर पे गठरी पाप की रे, डूबेगा मझधार।
कर्म ने कडे छुपाएगा।।
कृष्णा में तू लगा रहे तन नहीं धर्म की जान।
मन विश यू में लगा रहे तेरी कुत्ते बरगी बान।
इस मन ने कब समझाएगा।।
झोली से झगड़ा हुआ रे पच-पच मरा जहान।
कह कबीर सुनो भाई साधो, धर के देखो ध्यान।
भजन बिन खाली जावेगा।।
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