*1536 निर्गुण अजर अमर रे हंसा।।671।।

सरगुन मरण जीवन वाली शंसय, निर्गुणकी गम कर ले हंसा
              निर्गुण अजर अमर रे।।
जन्म मरण से न्यारे हंसा, ना इनपे कालचक्र रे।
मरण जीवन में दुनिया सारी, साध की सूरत शिखर रे।।
     धरती आकाश से साधु ऊंचे, इनकी तेज मंजिल रे।।
     पवन से आगे संत चलत हैं, इनका तेज सफर रे।।
ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों इनको भी नहीं खबर रे।
कोई कोई साधू लखे हैं वाणी, वाणी बहुत जबर रे।।
      हद बेहद से परे बसत है, पर वाणी से पर रे।
      कह रविदास वे संत ना मरते रहते अमरापुर रे।।

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