*1513. क्यूँ चाल चलै सै काग की।।663।।

                               
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क्यूँ चाल चलै सै काग की, मनै हंस जान के पाला।।
मनै पाला हंसे का बच्चा, खूब चुगाया मोती सच्चा।
तूँ निकलाहै मति काकच्चा, इब समयआया तेरे भाग का।
                           रे तेरा मन विष्टा पै चाला।।
फर दे आवै फरदे उड़जा, सन्त शब्द फिर उल्टा पडजा।
घोड़ा छोड़ गधे पे चढजा, तेरी नीत हुई हराम में।
                          तनै मुँह करवा लिया काला।।
मनै बाग लगाया नामी, इस कारण आगी खामी।
लाया आप कटाई जब तेरी, नियत हुई हराम।
                        मैं रह गया पेड़ निराला।।
मनै दूध पिलाया प्यारा, इस कारण लाग्या खारा।
जियादास कहदोष हमारा, तेरीशक्ल लगै जहरी नाग की।
                      तूँ बन गया डँसने आला।। 

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