*1499. हंसा कहां से आया रे।।658।।

                                
                                   658   
 हंसा कहां से आया रे,वहाँ का भेद बता भाई।
     तूँ तो पूरा ज्ञानी रे, इस का पद समझा भाई।।
धोले अम्बर धूल नहीं थीं, नहीं था चन्दा सूरा।
उस दिन की मनै खबर बता दे, कौन गुरु मिला पूरा।
  काया माया कुछ भी नहीं था, नहीं था ये ओंकारा।
  नाभि कंवल विष्णु भी नहीं था, कहां था हंस तुम्हारा
जिया जून में कुछ भी नहीं था नहीं था मुल्ला काज़ी।
उसदिन की मनै खबरबतादो, किस दिन रची या बाजी।।
   काया में कुछ भी नहीं था, नहीं था पिंड ब्रह्मंडा।
   सूतक सातक काम चलाऊ, नहीं था 18 खंडा।
16 शंख पे तकिया हमारा, अगम महल पे चन्दा।
हंस सरूपी हम से निकले, काटन यम का फंदा।।
   इस ग़ैब का भेद न पाया, अनुरागी लौ लीना।
   कह कबीर सुनो जति गोरख, भेद न पाया मीना।। 




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