*1272. रस गगन गुफा में अजर झरै।।560।।
560 रस गगन गुफा में अजर झरै। बिन बाजा झनकार उठै जहां, समझ पड़ै ध्यान धरै।। बिना ताल जहां कमल फुलाने, तेहि चढ़ हंसा खेल करै। बिन चन्दा उजियारा दरसै, जहां तहां हंसा नजर पड़ै।। दसवें द्वारे ताली लागी, अलख पुरूष का जो ध्यान धरै। काल कराल निकट नहीं आवै, कामक्रोध मद लोभ जरै।। जुगन जुगन की तृष्णा मेटी, कर्म भर्म अथ व्याधि हरै। कह कबीर सुनो भई साधो, अमर होय कबहुँ न मरै।।
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