*1465 संतो भाई आई ज्ञान की आंधी।।
संतो भाई आई ज्ञान की आंधी रे।
भर्म की टाटी सभी उड़ानी, माया रहे ना बांधी रे।।
हित चित की दोऊ धूनी गिरानी, मोह बलिंदा टूटा।
तृष्णा छान पड़ी घर ऊपर, कुब्ध का भांडा फूटा।।
जोग जुगत कर संतों बांधी, निरचु चुवे न पानी।
कूड़ कपट काया का निकला, हरि की गति जब जानी।।
आंधी पीछे जल बूठा, प्रेम हरी जन भीना।
कह कबीर भान के परकटे, उदित भयो तम घीना।।
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