*1461 कोई सुनता है ब्रह्म ज्ञानी। गगन में आवाज हो रही झीनी।।
कोई सुनता है ब्रह्म ज्ञानी गगन में आवाज हो रही झीनी।।
पहले होता नाद बिंद से, फेर जमाया पानी।
सब घट पूर्ण पूर रहा है आदि पुरुष निर्वाणी।।
जो तन पाया पता लिखाया तृष्णा नहीं भुलानी।
अमृत छोड़ विषय रस चाखा उल्टी फांस फंसानी।।
ओहंग सोहंग बाजा बाजे, त्रिकुटी सुन्न समानी।
इंगला पिंगला सुषमणा सोधो, सुन्न ध्वजा फहरानी।।
दिद बंदिद नजरों से देखा, अजर अमर निशानी।
कहे कबीर सुनो भाई साधु यही आदि की वाणी।।
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