*1554। सुन सतगुरु की तान नींद नहीं आती।।

सुन सतगुरु की तान नींद नहीं आती।
हे विरह में सूरत गई पछाड़ी खाती।।
            तेरे घट में है अंधियार भरम की रा।
            तेरी हुईना पिया से भेंट रही पछताती ।।
सखी सेन बैन की बात ढूंढ क्यों ना लाती।
तेरे पिया बसे सतलोक नाम गुण गाती।।
            तेरी आवा गमन की त्रास सभी मिट जासी।
            छवि देखत भाई निहाल, काल मरझासी।।
सखी मानसरोवर ताल हंस जित पाती।
कहे कबीर विचार सीप मिले स्वाती।।

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