*1459. मोहे दिजो ज्ञान अपार साधु दीजो ज्ञान अपार।। 639

मोहे दीजो ज्ञान अपार, गुरु दे दो ज्ञान अपार।
सेवक शिष्य जानियो हमको, सतगुरु पालनहार।।

कैसे काबू होवे रे मनवा, साधक गति विचार।
जो भाखें सत्य वाणी शिष्य को, सो गुरु हो उदार।।

सूरत निरत का लक्ष्य बताओ, तत्व वास का सार।
काहे हेत मुंडावें सिर को, कौन ज्ञान करें पार।।

मन का रूप समझ ना पाऊं, ना जानू पवना सार।
प्राण दशा को जानू नाही, साधु बिन कौन द्वार।।

बिना मूल का कौन तरु, पंछी बिन पंखार।
बिन तटी नदी काल बिन मृत्यु, गोरख रहे पुकार।। 



Comments

Popular posts from this blog

*1272. रस गगन गुफा में अजर झरै।।560।।

स्वामी रणजीत सिंह प्रवचन।।

**1339 फकीरी का देखा लटका।।