*1474. कठिन चोट वैराग्य की।। कबीर।।647।।

                                  647
कठिन चोट बैराग की जाने कोई बिरला ए साध।।

कौन बूंद धरनी रची हे, कौन बूंद आकाश।
कौन बूंद साधु रचे कौन बूंद संसार।।

शब्द बूंद साधु रची हे सर्प बूंद आकाश।
सूरत बूंद साधू रचे हे गर्व बूंद संसार।।

रेन समाई भान में है भान समाया आकाश।
आकाश समाया सुन्न में, सुन्न या काहे में समाए।।

बिन देखे उस देश की ही बात करें सब कोई।
अपना खारी खाद्य है रे चेतन फिरे हैं कपूर।।

हम हमेशा उस देश के हैं छिन आवे छिन जाए।
कह कबीरा धर्मी दास से है आवागमन मिट जाए।।

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