*1482. चलो उस देश में हे हेली।।650।।

                               
                                 650
चलो उस देश में हे हेली, हुए काल की टाल।।
      निर्गुण तेरी सांकडी हे हेली, चढो न उतरो जाए।
      चढूं तो मेवा चाखलूँ हे, मेरो जन्म सफल हो जाए।।
अनहद के बाज़ार में हे हेली, हीरों का व्यापार।
सुगरा सौदा कर चले हे, नुगरा फिर फिर जाए।।
       गेहूँ वर्णो सांवरो हे हेली, रूपा वर्णो रूप।
       पिया मिले मोहे आदरो हे, पिया मिलन की आश।।
एक भान की क्या कहूँ हे, कोटि भान प्रकाश।
कह कबीरा धर्मिदास ने, मैं सदा पीव के साथ।। 

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