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अनाहत नाद से क्या प्राप्त होता है? What does Anahata get from Naad?

नाहत नाद से क्या प्राप्त होता है? अनाहत नाद प्रश्नकर्ता:  अनाहत नाद अर्थात् क्या? दादाश्री:  शरीर के किसी भी भाग का नाद पकड़ लेते हैं, वह हार्ट के पास, कोहनी के पास, कलाई के पास नाद आता है, उस नाद के आधार पर एकाग्रता हो जाती है और उसमें से आगे बढ़ते हैं। वह किस प्रकार का स्टेशन है वह भी समझ में नहीं आता।  बहुत प्रकार के स्टेशन हैं, लेकिन उनसे आत्मा नहीं मिलता। वह मार्ग आत्मप्राप्ति वाला  मोक्ष  मार्ग नहीं है।  वह ध्येय नहीं है, लेकिन रास्ते में आनेवाले स्टेशन हैं, केन्टीनें हैं।  यदि आत्मा बन गया है, ब्रह्म बन गया है, तो फिर ब्रह्मनिष्ठ बनना है और तभी काम पूरा होगा,  वर्ना यदि महाराज खुद ही ब्रह्मनिष्ठ नहीं बने होंगे, वे ही जगत्निष्ठा में होंगे, तो अपना क्या भला होगा? ब्रह्म तो है ही सभी में लेकिन उन्हें जगत्निष्ठा है। अभी जगत् के लोगों की निष्ठा जगत् में है। जगत् के सभी सुखों को भोगने की निष्ठा है। लेकिन ‘ज्ञानीपुरुष’  उस पूरी निष्ठा को उठाकर ब्रह्म में बैठा देते हैं इसलिए जगत् निष्ठा फ्रेक्चर हो जाती है  और तभी अंतिम स्टेशन आता है और फ...

कबीर कब आओगे गुरुजी। kabir ke shabd no 53

   कब आओगे गुरू जी म्हारे देश, मीरा देखै बाट खड़ी। आवन आवन कह गए सद्गुरु, कर गए कौल अनेक। गिनते-२ घिस गई मेरी उंगली की ये रेख।।       सद्गुरु जी को ढूंढन चाली, करके भगवां भेष।     ...

अपने दुश्मन आप - Your enemy you

आचार्य प्रशान्त – उद्गार मौन के Advertisements Report this ad अपने दुश्मन आप वक्ता: हमने कहा था कि माइंड(मन) इज़ ब्रेन(मस्तिष्क) प्लस इंटैलिजैन्स(बोध)। जब तक ये ब्रेन परिपक्व नहीं होगा, एक मैच्योरिटी...

बुद्ध की भविष्‍यवाणी - Buddha's Prophecy

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रविवार, 15 मई 2011 बुद्ध की भविष्‍यवाणी—(ओशो की सभागार)  कथा यात्रा-- सुभूति ने पूछा भगवान बुद्ध से जो आप बोल रहे है, वह आज आपके संग साथ होने पर भी हम समझ-समझ कर समझ नहीं पाते। क्‍या आने वाले समय में , युगांतर काल में, आखिरी पाँव सौ वर्षों में, इस सम्‍यक शिक्षा के पतन काल में जो कि जब इस सूत्र के ये बचन समझायें जा रहे होंगे तो इनके सत्‍य को समझेंगे ?       तब भगवान बुद्ध ने उत्‍तर दिया: ऐसा मत बोलों सुभूति, हां तब भी ऐसे लोग होंगे जो कि इनके सत्‍य को समझ रहे होंगे। क्‍योंकि सुभूति, उस समय भी बोधिसत्‍व होंगे। और ये बोधिसत्‍व, सुभूति उस प्रकार के न होंगे जिन्‍होंने कि केवल अकेले एक बुद्ध का सम्‍मान किया है। न वैसे होंगे जिन्‍होंने कि अपनी पुण्‍य की जड़ें केवल अकेला एक बुद्ध में जमा रखी है। उलटे सुभूति वे बोधिसत्‍व जो कि जब इस सूत्र के ये बचन समझाए जा रहे होंगे, एक अकेला विचार भी निरभ्र श्रद्धा का पायेंगे। वे वैसे होंगे जिन्‍होंने लाखों-लाखों बुद्धों का सम्‍मान किया है। वैसे होंगे जिन्‍होंने अपनी पुण्‍य की जड़ें लाखों-लाखों बुद्धों में जमा रखी होगी। सुभूत...

मन से मुक्ति मन की चाल - Freedom of mind

मन से मुक्ति मन की चाल वक्ता: मन को मिरतक देखि के, मति माने विश्वास साधु तहाँ लौं भय करे, जो लौं पिंजर साँस।। ​          माया के बड़े से बड़े छलावों में यह है कि ‘मैं नहीं हूँ’। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि भ्रम नहीं है, सबसे बड़ा बंधन यह है कि बंधन नहीं है। यूँ हीं नहीं कहा है कबीर ने, ‘माया महा ठगनी हम जानी’। ऐसे ही ठगती है वो कि मैं हूँ हीं नहीं, मैं हूँ हीं नहीं। जो भी तुम्हें प्रतीत हो रहा है, सब सच है, यही तरीका है माया के ठगने का। नहीं, आकर्षण नहीं है, प्रेम है। नहीं कल्पना नहीं है, तथ्य हैं। नहीं भय नहीं है, करुणा है। नहीं बेड़ियां नहीं हैं, आभूषण हैं।        यदि भ्रम दिख हीं जाये कि भ्रम है तो बहुत समय तक चल नहीं सकता। यदि बेड़ियां दिख हीं जायें कि बेड़ियां हैं तो कोई बंधा क्यों रहेगा, यदि मूर्खता दिख ही जाये कि मूर्खता है, तो बुद्ध हीं बुद्ध होंगे। यदि अधर्म दिख ही जाये कि अधर्म है, तो संसार धार्मिक हो जायेगा। कभी-कभी दिखने भी लगता है। ऐसे भी क्षण आते हैं जब अचानक से दिख जाता है। अनायास ही आते हैं, हमारे करे नहीं आते हैं, बस यूँ ही। किसी की अ...

भजन भरोसा एक बल - Bhajan trust - a force

ओशो गंगा/ Osho Ganga गुरुवार, 28 सितंबर 2017 दरिया कहे शब्द निरवाना--प्रवचन-03 भजन भरोसा एक बल—(प्रवचन—तीसरा) दिनांक 23 जनवरी 1979 ; श्री रजनीश आश्रम, पूना सारसूत्र : बेवाह के मिलन सों, नैन भया खुसहाल। दिल मन मस्त मतवल हुआ, गूंगा गहिर रसाल।। भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास। प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।। है खुसबोई पास में, जानि परै नहिं सोय। भरम लगे भटकत फिरे, तिरथ बरत सब कोय।। जंगम जोगी सेपड़ा पड़े काल के हाथ। कह दरिया सोइ बाचिहै, सत्तनाम के साथ।। बारिधि अगम अथाह जल, बोहित बिनु किमि पर। कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मंजधार। निर्वाण की सुगंध उनके ही शब्दों में हो सकती है जो समग्ररूपेण मिट गए; जो नहीं है। जिन्होंने अपने अहंकार को पोंछ डाला। जिनके भीतर शून्य विराजमान हुआ है। उसी शून्य से संगीत उठता है निर्वाण का। जब तक बोलने वाला है तब तक निर्वाण की गंध नहीं उठेगी। जब बोलने वाला चुप हो गया, तब फिर असली बोल फूटते हैं। जब तक बांसुरी में कुछ भरा है, स्वर प्रकट नहीं होंगे। बांसुरी तो पोली हो, बिलकुल पोली हो,तो ही स्वरों की संवाहक हो पाती है। दरिया बांस की पोली पोंगरी है। शब्द नि...